Monday, March 18, 2013

युवराज की पार्टी

(ये एक काल्पनिक घटना है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति विशेष या स्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है)

पौ फटी नहीं की युवराज के इस बेनामी फार्महाउस पर डॉक्टरों का आना जाना शुरू हो गया। दर्जन भर युवा नेता, अभिनेता, पेज थ्री व्यक्तित्व अपने लाल पड़े, लहूलुहान हुए सीनों के ऊपर मरहम पट्टी करवा रहे थे। कुछ की कराहें  निकल रही थी जब डॉक्टर गर्म पानी के सहारे उनके छातियों से फेविकोल से चिपके विभिन्न अर्धनग्न नायिकाओं और मॉडल्स के फोटो को खींच-खींच कर अलग कर रहे थे। चेले चमचे हैरान परेशान इधर उधर भाग रहे थे और डॉक्टरों को बेवजह हड़का रहे थे। प्रेस वालों को फार्महाउस के गेट पर ही रोक लिया गया था और कैमरा बिलकुल वर्जित था।

हुआ यह था की युवराज के नेता बनने की औपचारिक घोषणा के बाद उनके चमचों ने उनसे एक जोरदार  पार्टी की गुजारिश की। कुर्सी पर बैठे युवराज गहन मुद्रा में थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था की रातों-रात पूरे देश की जिम्मेवारी उनके ऊपर आन पड़ी है। पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ बता देना आवश्यक है की युवराज की स्थिति उन  नौजवानों  के जैसी है जो मूवी हॉल में फिल्म की (सुन्दर) अभिनेत्री को गरीब होकर बर्तन धोते देखकर तो फूट फूट कर रोते हैं पर अपने घर में रोज बरतन धोती हुई अपने माँ - बहन की कोई सहायता तक नहीं करते। आधे से ज्यादा उनके चमचे उनको मूर्ख ही समझते हैं और आहे-बगाहे उनकी पीठ पीछे उनका मजाक उड़ाते हैं पर सामने तो झुक के सलाम मारना ही होता है। ऐसा है युवराज का पूरा व्यक्तित्व।

खैर पार्टी का तमाम इन्तेजाम मिनटों में हो गया और देर रात पार्टी की शुरुआत हो गयी। युवराज के खासमखास मित्र जिसमे से कुछ नेता, चमचे, उद्योगपति, एक्टर, क्रिकेटर, समाजसेवी, पत्रकार सब युवराज के बुलावे पर पलक झपकते ही पार्टी में शरीक होने को आ गए। कुछ बूढ़े  जो अपने को अभी भी जवान समझते थे और पार्टी में युवराज के सबसे बड़े चमचे की पद के लिए आगे होड़ में रहते थे उन्हें भी युवराज का विशेष बुलावा मिला। पुलिस को पहले ही इन्फॉर्म कर दिया गया था सो मेहमानों की सुरक्षा के लिए पुलिस की एक टुकड़ी भी आन खड़ी थी। पार्टी का नशा जब ज्यादा चढ़ा तो मदिरा और नशे का दौर चालू हो गया। चमचे युवराज स्तुति गान में लग गए।

एक ने कहा "युवराज जी आपके हाथ में सत्ता आते ही सबसे पहले गली नुक्कड़ों पर सुलभ शौचालय की तर्ज पर सुलभ नशालय खुलना चाहिए जहाँ लोगों को अच्छी किस्म की मदिरा (देसी-विदेशी ) और अन्य तरह के नशा के साधन अच्छी और उचित कीमत पर उपलब्ध हो।" बाकियों ने हाँ में हाँ मिलायी। युवराज चुपचाप मदिरा का गिलास पकड़ गहन मुद्रा में खड़े थे। यूँ प्रतीत हो रहा था की उनका दिमाग पता नहीं कहाँ की कौन सी नयी स्ट्रेटेजी पर सोच में लगा पड़ा है। चमचों ने उनकी तुलना अरस्तू और सुकरात तक से कर डाली।

अचानक से एक फ़ोन आया और युवराज को रुखसत लेना ही पड़ा। चमचों ने रोकने की बहुत कोशिश की मगर फिर सबको ये भी पता था की युवराज पर तो पूरे देश की जिम्मेवारी है शायद वह इससे ज्यादा समय दे नहीं सकते। वैसे भी मेहमानों का सारा ध्यान तो भूने हुए मुर्गों और शराब के विभिन्न किस्मो में ज्यादा था। युवराज ने उनकी अनुपस्थिति में भी पार्टी जारी रखने का हुक्म दिया कुछ जरूरी निर्देश दिए और अपने कुछ बहुत खास चमचों के साथ पार्टी से रुखसत लेकर निकल पड़े।

पार्टी का नशा धीरे-धीरे और ऊपर जा रहा था। अन्दर की सारी सरगर्मी अब बाहर खड़े सुरक्षा में चौकस पुलिसकर्मी तक पहुँचने लगी थी। हंसी मजाक के साथ शराब का नशा कभी-कभी छोटे मोटे झगड़ों तक पहुँच रहा था और पार्टी में जमे कुछ लोग उन झगड़ो पर एक दूसरों को लतिया और जूतिया भी रहे थे। बाहर खड़े सारे पुलिसकर्मी चुपचाप अपने जगह पर जमे थे। आज ड्यूटी पर तैनात थे बड़े कर्मठ नौजवान अफसर  श्री आदर्शवादी सिंह। इंस्पेक्टर सिंह युवा थे, कई मैडल हासिल कर चुके थे और युवराज से जबरदस्त फैन थे। उन्हें पूर्ण विश्वास था की देश की चरमरा रही सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था का इलाज बस युवराज और उनके चमचों के पास है। उन्होंने युवराज को विदेशी जूते पहने हुए खेतो में दिहाड़ी मजदूरों के साथ पसीना बहाते हुए भी देखा था और उनका विश्वास अटूट हो चूका था।

"ओ पालनहारे, निरगुन और न्यारे तुमरे बिन हमरा कौनों नाहीं" ।

मगर आज ये स्याह रात में चल रही पार्टी को देख कर और पार्टी के अन्दर चल रहे मस्ती, अभद्र भाषा, लात-जूतों का खेल देख कर उनका विश्वास थोडा डोल गया था। ह्रदय फटने लगा तो चले पकाने अपने एक मित्र को  जो श्री यथार्थवादी सिंह थे और अच्छे कर्मचारी होने के अलावा हकीकत की दुनिया में गोते लगाते थे।

आदर्शवादी उवाच, "यथार्थवादी भाई ये सब कुछ ठीक नहीं हो रहा। अपने सारे नौजवान नेता और सेलिब्रिटी जो कितने ही नौजवानों के आदर्श हैं इस तरह के खेल में लगे हुए हैं। ये कर क्या रहे हैं? इन सबसे देश को  बहुत आशा है और इन्हें तो दिन-रात देश की उन्नति के बारे में सोचना चाहिए और अनवरत काम करना चाहिए था। ये कहाँ शराब के नशे में एक दूसरे के साथ गाली गलौज कर झगड़ रहे हैं। हमें अन्दर चल कर इन लोगों को समझाना चाहिए। "


यथार्थवादी पहले से अचानक आ लगी इस देर रात की ड्यूटी से शायद उखड़े हुए थे। उनको  आदर्शवादी की बात अनर्गल लगी। उखड़े स्वर में बोले "लो कर लो बात ! तुम फिर चालू हो गए। अरे भाई ये सब नए ज़माने के ब्राह्मण हैं और उनका झगडा या मतान्तर उनको आपस में सुलझाने दो। ये मेरे तुम्हारे जैसे नए ज़माने के शूद्रों के वश की बात नहीं। सदियों पहले कर्म के आधार पर वर्ण तय होते थे, फिर जन्म के आधार पर। अब ये धन के आधार पर तय होता है। पहले धन कमाओ और नए ज़माने के ब्राह्मणों में अपनी जगह बनाओ फिर देना फंडे।"

आदर्शवादी सोच में पड़ गए। यथार्थवादी की  इज्जत करते थे सो उलट कर  बोलने की हिम्मत हो नहीं सकी। चुप ही रहे। इधर यथार्थवादी का प्रवचन चालू था।

"इतना मुश्किल भी नहीं अपना वर्ण बदलना इस खुली व्यवस्था में। उदहारण के लिए अपने कई नेताओं, फिल्म स्टारों, क्रिकटरों, प्रवचन देने वाले साधुओं को देखों। ये सब लोग कमजोर वर्ग से आये। इन सब लोगों ने पहले धन कमाया और अपनी जगह नए ज़माने के ब्राह्मणों में बनाई और अब अगर वो कुछ फंडे देंगे तो सब सुनेंगे। बाकियों की कोई क्यों सुने? नियम से तो जब इन नए ज़माने के ब्राह्मण सब पार्टी कर रहे हैं तो हम सब नए ज़माने के छोटे वर्ण वालों को अपने अपने जूते - चप्पल सर के ऊपर रख कर चुपचाप खड़े रहना चाहिए। गनीमत समझो की उनके सामने जूते चप्पलों में गुजरते हो अभी तक। ये तो अपना सौभाग्य है कि हमें कमसे कम अन्दर से कुछ खाने वाने को भी मिल रहा है। देना सीखो ... लेना नहीं। क्योंकि "जो लेता है वो नेता है और जो देती है वो जनता है"। और देना मतलब फंडे देना नहीं।"

आदर्शवादी को लगा की यथार्थवादी का शायद मूड ज्यादा ख़राब है और इस वक़्त ज्यादा जिरह करना अच्छा नहीं है। मगर उनकी बात ठीक भी तो है।  मुंह लटकाए चुपचाप पुलिस जीप की दूसरी तरफ जाकर बैठ गए।

अन्दर का हाल सुनिए। थोड़ी देर सर-फुट्टोवल के बाद और कुछ दबंग युवा नेताओं के बीच-बचाव के बाद छोटे मोटे हो रहे मुक्केबाजी का दौर ख़तम हो गया था औए एक रंगीले युवा ने DJ से कह कर नया फेविकोल वाला गाना चालू करा दिया था। गाना बजते ही पिक्कारिओं की गूँज उठी। शराब के नशे में अपादमस्तक सराबोर देश के कुछ युवा धनाढ्य जो आज इस पार्टी के लिए जमा हुए थे, गाने की ताल पर थिरकने लगे।

"मेरे फोटो को सीने से यार चिपका ले सैयां फेविकोल से "


एक मुस्टंड नव धनाढ्य अपराधिक चरित्र के दसवीं फेल युवा नेता को अचानक न जाने क्या सूझी और आनन फानन में अपनी SUV से जाकर एक दुकान वाले को धमका कर पूरा फेविकोल के डिब्बों का बक्सा ही ले आये और फिर सचमुच अपनी बनियान उतारी और अपनी एक पसंदीदा फोटो को अपने सीने पर फेविकोल के सहारे चिपका डाला। नशे में धुत बाकी लोगों को ये नायब आईडिया बड़ा पसंद आया। फिर क्या था, सब के सब अपनी अपनी पसंद की अर्धनग्न नायिकाओं और मॉडल्स के फोटो को अपने अपने सीने में फेविकोल से चिपकाने लगे और बेतहाशा नाचने लगे। मजाक मजाक में कई घंटे निकल गए और नाच नाच के थक गए सब पार्टी प्रेमी सीने पर चिपके हुए फोटो के साथ वहीँ फर्श पर  विचित्र पोजीशन में लुढ़कने लग गए। और फिर फेविकोल ने तो अपना असर दिखाना ही था।

मुर्गे की पहली बांग के साथ ही सुबह होते ही जब होश आया तो सबने अपनी अपनी आँखे मली और जब अपने सीने से चिपके फोटो को निकलने की कोशिश की तो ........


आगे का हाल तो आप सबको पता ही है ..............

Monday, November 5, 2012

युवराज का नायाब आईडिया

युवराज नेताजी से बहुत नाराज हैं, ऐसा नेताजी को अभी-अभी पता चला है। युवराज के एक खासमखास चमचे ने आकर फिलहाल कुछ दिनों से स्पष्ट हो रही युवराज की बेरुखी का कारण  नेताजी को बताया। ऐसा जानते ही नेताजी डर से सकपका गए। अब ये तो सुनिश्चित था कि नेताजी को युवराज का कोपभाजन बनना ही पड़ेगा मगर सजा का स्तर क्या होगा ये अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया था। प्रेस में आ रही मंत्रिमंडल बदलाव का समाचार सुनकर वो असमंजस में थे कि कहीं युवराज की नाराजगी के चलते उनसे उनका मंत्री विभाग न छीन लिया जाये जिसपर  वो पिछले तीन वर्षों से कायम थे और उनके हिसाब से ऐतिहासिक काम कर रहे थे।

तभी न्यूज़ आया की सचमुच नेताजी की दुनिया लुट चुकी है और उनके हाथ से मंत्रीपद निकल कर उनके परम विरोधी साहूजी के हाथ चला गया है जो आजकल युवराज के खासमखास माने जा रहे हैं। खबर आते ही नेताजी उदासी में डूब गए और पैग पे पैग मारने लगे। उनकी पत्नी ने अपना सर पीट लिया। इस गर्मी छुट्टी में स्विट्ज़रलैंड जाने की सारी उमीदों पर पानी फिर चुका था। अपने गुस्से को काबू न कर पाते वो नेताजी को खड़ी-खोटी सुनाने लगी तो नेताजी उदास शब्दों में इतना ही बोल पाए "शांत भागवान, शांत! अपने चिराग ने ही अपने घर में आग लगा डाला तो कोई क्या कर सकता है?"

 "अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत।"

दरअसल पिछले "मैंगो" चुनाव से तुरंत पहले, एक सोची समझी रणनीति के तहत महाराज ने युवराज के एक एम्बिसिअस प्रोजेक्ट "पूजास्थल पादुका चोरी नियंत्रण" को बड़े पैमाने में शुरू किया। युवराज को यह ज्ञात था की पूरे देश भर में, भाषा, जाति, धर्म और राज्यों की सीमाओं से हट कर, हर धर्म के पूजा स्थलों से चप्पलों, जूतों की चोरी का एक स्व विकसित सेक्टर है जो अन-आर्गनाइज्ड है और उसमे विकास की भरपूर गुंजाईश है। ये समय की मांग थी कि सरकार इस सेक्टर में भी नियमितता लाये और इस सेक्टर से जुड़े लोगों के ऊपर कुछ रूल्स रेगुलेशन लागू करे। इन सब चीज़ों के लिए त्वरित रूप से एक मंत्रालय का निर्माण किया गया। नेताजी के बेटे पन्तु (पतनवीर लेता) स्कूल के ज़माने से इस तरह की छोटी मोटी चोरियों में अच्छी खासी अनुभव रखता था और यह महाराज को भी मालूम था। महाराज ने यह सोचकर की पन्तु का इस सेक्टर का अनुभव काम आएगा, नेताजी को इस नए मंत्रालय का कार्य भार सौंप कर उन्हें मंत्री बना दिया। नेताजी ने बहुत कम समय में मंत्रालय का काम बखूबी निभाया और पूरे देश में पादुका चोरी का लाइसेंस अपने मन मुताबिक  रजिस्टर्ड चोर-दलों को ले-दे कर वितरित कर दिया। एक चौथाई से ज्यादा लाइसेंस तो पन्तु के द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चल रहे चोर-दलों को ही मिला। "मैंगो" चुनाव आते-आते हालात  काफी सुधर गए थे। जनता खुश थी, महाराज अति प्रसन्न, और युवराज की तो बांछे खिल गयी थी। पहली बार उसके आईडिया को इस स्तर पर लोगों ने स्वीकारा था। अब तक विपक्षी लोग उसे प्रत्यक्ष और समर्थक लोग परोक्ष रूप से मंदबुद्धि बोलते थे। चमचों ने युवराज के इस नायाब आईडिया का हर जगह जम कर  प्रचार किया और युवराज की स्तुति में चप्पल चालीसा तक लिख डाली। अब लोग बिना भय के बेरोक टोक चप्पल/जूते खोल के पूजा स्थल जाते थे। वापस आने पर अगर उनकी पादुकाएं जगह पर नहीं मिलती थी तो वो वहां चलाये जा रहे सरकारी सहायता केंद्र से निशुल्क सेवा पाते थे। सेवा केंद्र के कर्मचारी इन्टरनेट के जरिये वहां के लाइसेंस्ड सारे चोर-दलों से संपर्क करते थे और गायब हुए जूते/चप्पल तुरंत ट्रैक हो जाते थे। आपको बस एक मामूली सी रकम उस चोरी करने वाले चोर-दल को अदा करनी होती थी और आपकी पादुकाएं अच्छे हालत में आपको वापिस मिल जाती थी। अमूमन कोई अन रजिस्टर्ड चोर-दल या दुसरे एरिया के चोर-दल अगर आपकी पादुका ले गया तो सरकारी सहायता केंद्र त्वरित करवाई करके आपकी पादुका को सही सलामत आप तक पहुंचाता था और नियम के तहत दोषी पाए गए चोर-दल के ऊपर मुक़दमा चलाया जाता था। नेताजी ने बहुत कम समय में इस सारे सेटअप को उचित दिशा दी थी और युवराज उनके काम से बहुत खुश हो गए थे। "मैंगो" चुनाव में इसी उपलब्धि को एक बड़ा मुद्दा बना कर महाराज ने युवराज के क्रन्तिकारी सोच को प्रोजेक्ट कर उसे भविष्य का नेता बताते हुए विपक्षी पार्टियों को धता बता दिया था। नेताजी अब महाराज के "किचेन कैबिनेट" के सदस्य बन चुके थे और युवराज के खासमखास थे। महाराज ने मात्र उनका ही मंत्री-विभाग चुनाव के बाद भी बरक़रार रखा था।

सबकुछ ठीक थक चल रहा था की अचानक से पन्तु के द्वारा की गयी एक गलती नेताजी के गले में फांस बन गयी ऐसा प्रतीत हो रहा था। हुआ यह की युवराज ने अपने युवा मित्रो से मिलने का अचानक प्रोग्राम बना लिया वो भी नेताजी के शहर में। नेताजी ने तुरंत अपने सारे चमचो को युवराज के स्वागत के लिए की जा रही सारी  तैयारियों में लगा दिया। सुना युवराज किसी गरीब के घर जाकर खाना पसंद करते हैं सो पिछले दरवाजे से कैसे पांच सितारा होटल का खाना उस गरीब के घर पहुँचाया जाये, इसकी जुगत भी उन्होंने भिड़ा डाली थी। इसके अलावा युवराज के द्वारा की जा रही युवा चेतना रैली के लिए खाने और पैसे का प्रोलोभन दे कर गांवों से बहुत  सारे बेरोजगार युवाओं का भी इन्तेजाम नेताजी और पन्तु ने बखूबी निभाया था।

तक़दीर का तमाशा देखिये। "जब किस्मत में हो रोड़े, तो कहाँ से मिलेंगे पकोड़े?"

हुआ यह कि प्रोग्राम के मुताबिक, युवराज ने एक गरीब के घर पिछवाड़े के दरवाजे से लाया हुआ पांच सितारा होटल का खाना खाया, चमचे के साथ दो चार कश लगाए और उसके बाद  सभा स्थल तक जाते-जाते रास्ते में एक ATM पर रूक कर पैसे निकालने लगे। युवराज ATM को लक्ष्मी माता का मंदिर मानते थे और ATM के प्रति पूरी श्रद्धा रखते थे। इसीलिए वो ATM में जाने से पहले अपने जूते जरुर निकाल लिया करते थे। उस दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया। युवराज जैसे ही पैसे लेकर  ATM से बाहर निकले, उन्होंने अपना जूता गायब पाया और उनके गुस्से का कोई अंत नहीं था। वह जूता युवराज को बहुत प्यारा था और उन्होंने उसे खास विदेश से मंगवाया था। चमचे तुरंत ही जूते की खोज में इधर उधर निकल पड़े। एक चमचे ने सुझाव दिया की सारा दोष विपक्ष पर जड़ दिया जाये और जल्दी से एक जूता खरीद कर यहाँ से निकला जाये। युवराज के एक खासमखास चमचे ने उनको नायाब सुझाव दिया। बोला "क्यों नहीं आपके द्वारा शुरू किये हुए पादुका चोरी विभाग की मदद ली जाये और जनता को एक औचक डेमोंस्ट्रेशन दिया जाये"। युवराज को सुझाव पसंद आया और एक परिपक्व नेता की तरह वो अपना गुस्सा पी गए। खड़े-खड़े घोषणा कर डाली "चलो पादुका चोरी नियंत्रण सहायता केंद्र चला जाये और जूता चोरी की घटना का रपट लिखाया जाये"। पूरा हुजूम उधर ही निकल पड़ा। युवराज नंगे पांव ही सड़क पर पैदल चल पड़े। हजारों की हुजूम साथ थी। न्यूज़ चैनल्स पर लाइव प्रसारण जारी था। पादुका चोरी नियंत्रण सहायता केंद्र पर ड्यूटी पर जमे एक अधिकारी ने तुरंत ही इन्टरनेट पर सारे चोर-दलों से संपर्क साधा और CCTV के फुटेज देख डाली। मिनटों में चोर का पता चल गया। धत तेरे की ..........! युवराज के जूते किसी और ने नहीं मगर आदत से मजबूर पन्तु ने चोरी कर डाले थे। दरअसल वो जूतों का जोड़ा था ही बहुत सुन्दर कि किसी भी चप्पल चोर का मन मचल जाए। विदेशी जूता चोरी करने  का लोभ पन्तु छोड़ नहीं पाया और उसने युवराज के जूते उड़ा डाले थे। युवराज को जूता तो मिल गया मगर वो क्रोध से आग बबूला हो गए और अपनी यात्रा को वहीँ ख़त्म कर राजधानी लौट गए।

इस घटना के बाद से नेताजी की घिघ्घी बंध गयी और डर तथा शर्म के मारे वो युवराज से कभी मिलने राजमहल न जा पाए। मन में शंका थी की मंत्री पद छीन लिया जायेगा। कुछ लोगों ने भरोषा दिलाया तो था कि शायद पन्तु की इस गुस्ताखी की इतनी बड़ी सजा नेताजी को न मिले मगर तक़दीर ने भी धता बता दिया और मंत्री पद से हाथ धो बैठे .............

Friday, October 26, 2012

नेताजी की उधेड़बुन - एक लघु कथा

नेताजी परेशान  हैं। दो दिन से ठीक से खाया पिया और सोया नहीं। दरअसल हुआ यह कि नेताजी ने अपने दूध वाले के नाम से एक फर्जी कंपनी खोल रखी थी और उस कंपनी को अपने पैसे से कागजी कर्ज देते थे। फिर वही कंपनी उनके द्वारा चलायी जा रही एक दूसरे कंपनी को कागजी कर्ज देती थी। इस तरह से उन्होंने एक अच्छा खासा ब्लैक होल बना लिया था जिसमे जितना भी पैसा डालो वह निगल जाता था। सबकुछ ठीक था और ये  गोलमाल बहुत से लोगों और दूसरे नेताओं को पता भी था मगर कभी कोई कुछ बोलता नहीं था। आहे बगाहे वो भी नेताजी की इस शातिर व्यवस्था का जरुरत पड़ने पर फायदा उठा लिया करते थे। अचानक से एक पगला खिचड़ीबाल क्या आ गया और उसने प्याज के छिलकों की तरह परत दर परत उधेड़नी शुरू कर दी। सारे टीवी चैनल वाले भी टीआरपी के चक्कर में नेताजी और उनके इस नए ब्लैक होल कांड के ही पीछे पड़ गए।

नेताजी सोचते सोचते थक गए "अरे मैंने क्या बिगाड़ा है? एक बड़े नेत्री के दामाद ने क्या कुछ गड़बड़झाला नहीं किया मगर उसे तो कोई कुछ बोलता नहीं है। बंदा रात में भी काला चश्मा पहन के इत्मिनान से देश विदेश की सैर कर रहा है। लोगों को "मैंगो" और देश को "बनाना" बता रहा है। इतना ही नहीं, पड़ोस की पार्टी के मेरे परम  मित्र और बड़े नेताजी के खानदान  के नाम तो पूरे भारत वर्ष की करीब-करीब सारी जमीन, इमारते, नदियाँ, नहरे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से होगी। सुना अब वो लोग लाल किले को अपने नाम करवाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। किसी ने कुछ कहा? मेरे इस अदने से कृत्य के पीछे सारे औने पौने लोग पड़े हैं। अरे वाह जी ......, तुम करो तो CC (कोड ऑफ़ कंडक्ट) और हम करे तो MC(????) ?"

आज तो सुबह से चाय तक नहीं पी नेताजी ने। दूधवाले ने दो दिन से दूध बंद कर रखा है। नेताजी को पाउडर वाली और टेट्रा पैक वाली दूध की चाय पसंद नहीं और आधे से ज्यादा पैकेट वाली दूध की कंपनियां तो उनकी ही है और उनको पता है की वहां किस तरह की दूध बना के बेची जाती है।

दूधवाले की परेशानी अलग है। वो कहता है, मेरे नाम से और मेरे तबेले के पते से आपने कंपनी खोली, कोई बात नहीं मगर मुझे दूध की मलाई नहीं तो कम से कम बर्तन से चिपक कर जलने वाला दूध/मलाई का भाग ही दे दिया होता। ये आम लोगों को भी आम खाने की आदत लग गयी है। उनको पता ही नहीं की "जो लेता है वो नेता है! जो देती है वो जनता है!" अब किसको किसको आम खानी और खिलानी है ये तो कोई स्पष्ट बता दे नेताजी को। सारी प्रॉब्लम वहीँ से शुरू होती है। सरकार  को ये खाने खिलाने का काम स्ट्रक्चर्ड करना चाहिए और रूल्स बनाने चाहिए नहीं तो कोई भी ऐरा गैरा  नत्थू खैरा आके बोलता है "मेहनतकश इस दुनिया में हम अपना हिस्सा मांगेंगे, एक बाग़  नहीं एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे .............."

चलो कोई नहीं कल से सारी फ़ोन लाइन्स बंद कर रखी  है और सारे न्यूज़ चैनल्स बंद। कौन मुंह लगे इन छिछोरों से। कहीं कुछ उल्टा सीधा मुंह से निकल गया तो और हंगामा अलग।

सोचते सोचते आँख लगी ही थी की एक लठैत चमचा अपना मोबाइल लहराते आया "नेताजी ........अरे उठिए नेताजी ! देखिए  सताधारी दल के वाचाल, अकर्मण्य, बृहदमुखी घिग्गी बाबा का फ़ोन आया है। लगता है अब आपके सारे दुःख जल्द ही दूर होने वाले हैं। उठिए और बात कीजिये घिग्गी बाबा से और कोई रास्ता निकालिए। कब तक अपने साथ हमारा भी आना जाना बंद करके रखियेगा। घिग्गी बाबा बहुत ही घाघ किस्म के इंसान हैं और उनके पास  किसी भी समस्या का निदान है।"

नेताजी ने मोबाइल अपने कान से लगाया और रो पड़े। उनका ज्यादा गुस्सा आम आदमी और रिपोर्टरों पर ही है ऐसा उनके वार्तालाप से ज्ञात होता है।

"घिग्गी बाबा, ये भी कोई तरीका है क्या मेरे जैसे राष्ट्रीय नेता से व्यवहार करने का? पूरा देश आजकल मेरे पीछे पड़ गया है। क्या आम ..... क्या खास?"

घिग्गी बाबा  उवाच "आपने भी तो गलती किया। पहले तो किसी के ऊपर भी आप लांछन लगाते रहे। जब-तब आपके मुंह से हमारे डपोड़शंख मंत्री प्रमुख और हाइकमान के बारे में अपशब्द निकलते रहे हैं। आपने उनके बाल बच्चों तक को नहीं छोड़ा है। आपने शायद वक़्त फिल्म का वो डायलॉग नहीं सुना है की जिनके खुद के घर शीशे के होते हैं वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंकते हैं। अब अपनी जली तो पता चला की कैसी होती है खलबली? रिपोर्टरों को कुछ देना दिलाना था और न्यूज़ सप्रेस करवाना था जैसे बाकी इश्यूज में होता है"

नेताजी उवाच "अरे बाबा ऐसा नहीं है। उसी दिन रात वाली पार्टी में आपके सामने ही, जब मेरा अशोभनीय चित्र "मिस मजबूरी" के साथ एक रिपोर्टर ने ले लिया था तो वो न्यूज़ नहीं छापने  के लिए क्या मैंने उसे पैसे नहीं दिए? इतना कंजूस भी नहीं हूँ मैं। इसबार सारा प्रॉब्लम उस खिचड़ीबाल के कारन हुआ है। बंदा कम्प्रोमाइज को ही तैयार नहीं है। इधर कुछ दिनों से आम आदमियों की हिम्मत भी बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। साले आसानी से पीछा ही नहीं छोड़ते। मेरे दूध वाले को देखो। उसके नाम पर एक नकली कंपनी मैंने खोल रखी है ये पता चलते ही उसने दूध देना छोड़ दिया। बोलता है मेरा हिस्सा दो ............ वो भी सूद के साथ। "

घिग्गी बाबा ठठा के हंस पड़े।

 नेताजी उवाच "कोई रास्ता तो बताओ घिग्गी बाबा? मेरी इस हालत का ऐसे तो मजाक न उड़ाओ।"

घिग्गी बाबा  उवाच "अब तो बस कहीं खोपचे में दुबके रहो और इस समस्या से उबरने के दो ही रास्ते हैं। पहला ये की भगवान से मनाओ की कोई और बड़ा सनसनीखेज इश्यू जनता या मीडिया के हाथ आ जाये या फिर पाकिस्तान या ISI ही कोई अच्छा खासा बम विस्फोट किसी बड़े शहर में करवा डाले। दूसरा उपाय ये है की कैसे भी दिन बिताते जाओ। अपने यहाँ थोड़े अरसे के बाद, लोग कोई सी भी चीज़ भूल जाते हैं। तुम्हारा स्कैंडल कौन सी खेत की मूली है? इतिहास गवाह है की हमलोगों ने वक़्त के साथ कैसे-कैसे कुकर्मो को भुला दिया है। दस पंद्रह दिन में सब कुछ अपने आप शांत हो जायेगा। बस भगवान का नाम लो और समय बिताओ। और हाँ एकबार बच  गए तो अपनी जबान जरा संभाल के चलाओ। हमारी पार्टी का  वैल्यू है कि  हम किसी भी नेता के पर्सनल चीज़ों पर या फॅमिली पर कोई टिप्पणी नहीं करते वरना हमारे पास भी अच्छा खासा इनफार्मेशन होता है।"

नेताजी सहमत हुए और दुआ सलाम के बाद मोबाइल वार्तालाप समाप्त हुआ। नेताजी उत्साहित लग रहे थे। उनकी आँख में चमक दृष्टिगोचर हुयी।  बस थोड़े दिन की बात है। कैसे भी आगे के बीस - तीस  दिन निकल जाये। लठैत चमचा भी उत्साहित हुआ। जोश में बोला "मालिक, कहीं कोई साइंटिस्ट को पैसा खिला के 24 घंटे के दिन को 12 घंटे का नहीं बना सकते ताकि ये दिन जल्दी से कट जाये? या फिर भगवान् को ही कुछ खिला पिला के ये पूरा महिना ही कैलेंडर से गोल करवा दे तो ..... !"

नेताजी मंद-मंद मुस्कुराने लगे और बोले कि चलो कोई बात नहीं आज पावडर वाली चाय ही पी लेते हैं ......... !